फिर वही बात
आज छुट्टी का दिन है। पूजा का पति दफ्तर गया है। उसके सास – ससुर पास के शहर में किसी रिश्तेदार के घर गये हुए हैं। वे जा कर दो दिन हो चुके हैं और चार दिन बाद ही लौटेंगे। उसकी इकलौती बेटी किसी सहेली की शादी में गई है। कामकाजी महिला को ऐसे सुकून के पल बहुत कम ही मिलते हैं। उसके दफ्तर में शनिवार और रविवार को सप्ताहाँत के बदले मंगल और बुध को होता है। वह घर का सारा साप्ताहिक काम मंगल को कर चुकी थी। वैसे हर सप्ताह उसके सास – ससुर दिन में रहते हैं तो इतनी फुर्सत के पल नहीं मिलते हैं। उसके पति के जाने के बाद कुछ देर टीवी देखी। फिर आकर बिस्तर पर लेट गई। वह गहरी नींद में सो गई।
फोन की घंटी बजने से उसकी आँख खुली। उसे एहसास हुआ कि वह तीन घंटे से ज्यादा सोई थी। फोन की दूसरी तरफ से उसकी बेटी, अलका बड़ी जोश में बोली,’ माँ! मैं आपकी बहुत बड़ी चिंता कम कर दी। ना आपको मेरे लिए रिश्ता ढूँढ़ने की जरूरत पड़ेगी और ना ही मेरी शादी कराने की। मैं अपने पसंद के लड़के से शादी कर ली है। असल में आज मैं अपनी सहेली की नहीं किंतु स्वयं ही करने आई थी। मैं अपने ससुरात का पता देती हूँ। मेरे ससुराल आ कर मुझे आशीर्वाद देने आप दोनों आ जाना।’
पूजा की मानो धड़कन रुक गई। पहले तो उसे बुरा सपना लगा। पर बाद में समझ में आया कि वह सचमुच अपनी बेटी की भाग कर शादी की खबर सुनी। वह वैसे ही बिस्तर पर पड़ी रही। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। ना चाहते हुए भी आज से बीस – इक्कीस साल की पहले की घटनायें याद आने लगी।
पूजा का एक बड़ा भाई और एक छोटी बहन है। भाई आईआईटी में इंजीनियरिंग का पढ़ाई करके अच्छी नौकरी कर रहा था। पूजा को पढ़ाई करना उतना पसंद नहीं आता था। इसलिए घर वालों ने कम से कम बीए कर लेने की सलाह दी। किसी तरह स्नातक की पढ़ाई कर नौकरी करने लगी। उसके लिए रिश्ता ढूँढना भी उसके परिवार शुरू कर चुके थे। छोटी बहन भी आईआईटी में पढ़ाई कर रही थी। उसके पिता खाड़ी के देश में काम करते थे। उसके लिए रिश्ते आ रहे थे पर किसी न किसी कारण से जुड़ नहीं रहा था।
पूजा को शादी का शौक था। वह दफ्तर में भी किसी न किसी पर हर छः महीनों में डोर डालती रहती थी और प्यार में पड़ जाती थी। हर रिश्ता तब तक चलता था जब तक की सामने वाला जबरदस्ती पूजा से पीछा छुड़ा नहीं लेता। वैसे वह अच्छी थी, परन्तु उसको शादी की जल्दी थी। पर भगवान उस पर जरा सा भी तरस नहीं खा रहे थे। वह किस से शादी करेगी और इसका उसकी पूरी जिंदगी पर कैसा असर पड़ता है- यह सब सोचना उसके बस की बात नहीं थी। यह सिलसिला कई महीनो तक चलता रहा। पर वह काम अच्छा करती थी। इसी वजह से किसी ने उसकी इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिते थे। वैसे वह बाकी सब मामलों में भी बड़ी अच्छी थी।
बात उन दिनों की थी जब दफ्तर में पहले मैनेजर जाने के बाद दूसरे शहर से तबादला होने पर भास्कर नामक मैनेजर पहुँचा। कुछ दिनों में पूजा को पता चला कि उसका परिवार उसी शहर में रहता है। उसके पिता एक छोटी सी सरकारी नौकरी से सेवा निवृत हो चुके थे। घर भास्कर के वेतन से ही चलता था। आर्थिक मामला या फिर पढ़ाई के मामले में दोनों परिवारों में ज़मीन – आसमान का अंतर था।
भास्कर को बहुत जल्दी ही समझ गया कि पूजा को सिर्फ शादी का भूत चढ़ा हुआ है वर्ना उसमें पत्नी के होने वाले सारे गुण हैं। वह यह भी समझ गया कि यदि उसे अपनी बिरादरी में शादी करना पड़ा तो उतना दहेज तो मिलेगा ही नहीं पर उतनी पढ़ी – लिखी और कामकाजी मिलना तो नामुमकिन ही है। तो पूजा पर डोरे डालना ही उसके और उसके परिवार के आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए उत्तम सीढ़ी लगा। अंत में वह पूजा पर डोरे डालने लगा। वैसे पूजा को फँसाना बहुत आसान था। पर साथ में वही अभी कहता था कि उसके माता – पिता को अपनी बिरादरी में ही शादी करना पसंद है। वह पहले ही अपने माता – पिता को इस जाल में शामिल कर चुका था। और यह बात पूजा की शादी के पाँच साल बाद तब पता चला जब उसकी सास अपनी सहेली को बता रही थी और पूजा का दफ्तर से वापस आने का अंदेशा उसकी सास को नहीं हुआ था।
फिलहाल पूजा भास्कर के मामले में पूरी तरह से दीवानी हो चुकी थी भास्कर अपने माता – पिता से तीन – चार बार मिला चुका था। सही समय से वह बातों में इशारे करने लगा कि उनकी बिरादरी में बहुत दहेज लिया जाता है यह बात कई बार कहने पर पूजा में असुरक्षित की भावना जागने लगी। अंत में जब पूजा धैर्य खोने लगी तो वह अपने माता – पिता से भी कहलवाना शुरू कर दिया। उसी समय उसके लिए एक बड़े अफसर के रिश्ते के लिए लड़के वालों से हामी भी मिल गई। पूजा के पिता बीस दिन में आ रहे थे तो आगे की बातचीत के लिए बीस – पच्चीस दिन का समय माँगे। लड़के वाले मान गये।
यह बात किसी तरह से भास्कर को पता चल गया। वह अपने घर पूजा को लेकर गया। वहाँ उसके पिता सीधे तौर पर कह दिये कि यदि उसे दस लाख नगद दहेज में मिल जाये तो वह उनका शादी दस दिन में कर देंगे। पूजा थोड़ी सोची। बाद में वह बताई कि उसके एफडी और म्युचुअल फंड में कोई तीन लाख होंगे और बाकी वह पर्सनल लोन ले कर ही दे सकती है। इसका मतलब यह होगा कि उसको शादी के बाद भी नौकरी करने की अनुमति देना होगा। वे सहर्ष स्वीकार कर लिये।
यह तो बाद में पूजा को समझ में आया कि उनकी बिरादरी में उतनी पढ़ी – लिखी लड़कियाँ होती ही नहीं है तो नौकरी करने का सवाल ही नहीं पैदा होता है। अगर लड़की पढ़ी – लिखी हो तो बड़े – बड़े अफसरों के साथ उनका रिश्ता चुटकी में पक्का हो जाता है।
शादी के बाद उसे एहसास हुआ कि उसके वेतन पर उसके ससुराल वाले निगरानी रखते थे। उसकी कई खर्चों और शौकों को धीरे – धीरे दबाया गया। शादी के दो साल में ही समझ में आ गया कि वह बहुत ही बड़ी भूल कर चुकी थी। पर नन्ही बेटी का चेहरा उसे कठोर निर्णय लेने से रोका। वैसे भी उसके मायके से रिश्ते सदा के लिए खट्टे हो चुके थे। तो अपने बारे में सोचना भी उसे बेवकूफी लगा।वह केवल अपनी बेटी के लिए जीना और उसके भविष्य के बारे में सोचना प्रारंभ की।
क्योंकि उसे समझ में आ गया की ससुराल वाले अपनी पोती के लिए खर्च नहीं करेंगे। तो वह वेतन में हर साल में होने वाली बढ़ोतरी के बारे में पूरी जानकारी देना बंद कर दी। वह एक अलग बैंक खाता भी खोली जिसमें अपने नाम के साथ बेटी को नॉमिनी बना दी। धीरे – धीरे उसमें रुपये जमा करने लगी। वह कम से कम आर्थिक रूप से उसका भविष्य सुरक्षित करना चाहती थी। फिर भी नौकरी, घर का काम और अन्य जिम्मेदारियाों में के साथ – साथ अपनी बेटी को पढ़ाना – लिखवाना कर देती। इतना काम के बाद भी ना उसके पति और ना ही अन्य सदस्य कभी भी उसे आराम करने को नहीं कहते। तो बहुत ही ज्यादा काम उसे सदा रहता थ।
आज एक फोन कॉल आकर उसे पूरी तरह से झंझर के रख रही थी। तो एहसास हो रहा था कि शायद वह माँ के रूप में अपने आप को निराश की है। कभी अपनी बेटी को समझाया ही नहीं की भाग के शादी करना कितना खतरनाक होता है। उसमें हुई नुकसान की भरपाई पूरी जिंदगी नहीं हो सकती है। शायद इसका नुकसान भविष्य में फिर उसके बच्चे भी भुगते। हाँ, अगर उसे मौसेरे भाई – बहन और ममेरे भाइयों का साथ मिलता तो बात शायद कुछ और होती। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। अब केवल अपनी बेटी की भविष्य के बारे में चिंता करने के और प्रार्थना करने के अलावा उसके पास कोई भी चारा नहीं है। पता नहीं उसके पति और ससुराल वालों को पता चलेगा तो कौन – कौन से तूफान आएंगे।