मेघना अपने माता – पिता और दो छोटे भाइयों के साथ शहर में रहती है। वह देखने में सुंदर है। वह इंजीनियरिंग में एम टेक कर चुकी थी और अपने ही शहर में एक कंपनी में काम कर रही थी। उसके दोनों जुड़वा भाई एमबीए की आखिरी साल की पढ़ाई कर रहे थे। उसके माता – पिता बच्चों को प्यार तो करते थे पर बिगाड़ने में भरोसा नहीं करते थे। इसलिए तीनों बच्चों को जिम्मेदार बनाये। तीनों बच्चे घर का और बाहर का काम कर सकते थे। मेघा चित्रकला में निपुण थी, उसका एक भाई फुटबॉल अच्छा खेलता था तो दूसरा सॉफ्टवेयर में निपुण था।
जिंदगी अच्छी जा रही थी। उसके पिता अफसर के रूप में एक कंपनी में कार्यरत थे। उनकी माँ सरकारी स्कूल में मास्टरनी थी। उनके पुरखों का गाँव शहर से कोई पाँच सौ किलोमीटर की दूरी पर है। गाँव में उनके परिवार को खाते – पीते खानदान में जाना जाता है। उनकी दोनों बुआओं की शादियाँ हो चुकी हैं और सुखी जीवन बिता रही है। या फिर अन्य शब्दों में कहा जाए तो उनके माता – पिता को कोई खास चिंता नहीं थी। बस अब अपनी इकलौती बेटी के लिए रिश्ते देख रहे थे। वह अपने आमदनी और हैसियत के हिसाब से पहले ही सोना – चाँदी की खरीदारी कर चुके थे।
वैसे रिश्ते आ रहे थे। पर कोई रिश्ता उनकी माँ को पसंद नहीं आता तो कभी उनके पिता को। तो कभी किसी को भी पसंद नहीं आता। पर इस बात से कोई ज्यादा चिंतित नहीं थे। उनकी बेटी काबिल है। पुरखों का नाम है। समाज में उनका अच्छा रुतबा है। तो रिश्ते आते रहते हैं। पर अपनी पुत्री और अपने रुतबे के हिसाब से नहीं आ रहा था। उन्हें पढ़ा लिखा और गुणी दामाद चाहिए था। भले ही लड़का गरीब घर का हो कोई बात नहीं थी। लेकिन लड़के की पढ़ाई – लिखाई और गुणों में कोई कमी नहीं होनी चाहिए थी।। यह छोटी सी बात कई लोगों को समझ नहीं आ रही थी और जान – पहचान के लोग खाते – पीते घर के रिश्ते तो लाते थे पर उनके लाये हुए रिश्ते में या तो लड़का उन के मन मुताबिक पढ़ा – लिखा नहीं होता या फिर गुणों की कमी होती।
बस जिन्दगी जा रही थी। लेकिन कोई इस वजह से अपनी नींद खराब नहीं कर रहे थे। एक बार उसके पापा के दोस्त के बेटी और दामाद मिलने आये। उनके पुरखों के गाँव के करीब के गाँव के रहने वाले थे। भारत में एक सच्चाई है कि कुँवारे लड़के या लड़की देखी नहीं की सभी को कोई ना कोई रिश्ता याद आ ही जाता है। यदि याद भी ना आए तो रिश्ते ढूँढने की बात अवश्य करते हैं। दामाद जी, नीरज बाबू भी यही बात कही। एक सप्ताह बाद अपने चचेरे भाई का रिश्ता ले आये। वह बताते हैं कि उन के परिवार में उनके चाचा ज्यादा अमीर हैं और लड़का अच्छा पढ़ा – लिखा है और साथ में गुणी भी है। फिर क्या था? तय दिन को मिलवाने ले आते हैं। लड़का ठीक – ठाक था और किसी बात पर भी एब नहीं निकाला जा सकता था। तो मेघना के परिवार ने हामी भर दी। अगले एक महीने में दोनों परिवारों का मिलना – जुलना हुआ। अंत में लेन – देन की बात के लिए दिन तय हुआ।
उन्हें मेघना के माता – पिता के द्वारा सोना – चाँदी में कोई आपत्ति नहीं थी। आस – पास के इलाके में एक लड़की को जितना सोना दिया जाता है उस से कम से कम दुगना सोने का इंतजाम कर चुके थे। उसी तरह चाँदी भी उम्मीद से ज्यादा था। नकद में भी कोई आपत्ति नहीं थी। समस्या आई ज़मीन पर। मेघना के परदादा जी कोई सौ बीघा से ज्यादा जमीन आर्जित किए थे। उसके दादा जी और छोटे दादा जी के बीच में बँटवारे के बाद एक – एक को पचास – पचास बीघा हिस्सा आया। ना उसके दादा जी और ना ही उसके पिता जी इस ज़मीन को खराब किये। खाने – पीने से ज्यादा उपज होती थी। अपनी नौकरी और खेती – बाड़ी की आमदनी से ही उनकी दोनों बुआओं का विवाह खाते – पीते घर में संपन्न हुआ। यही रवैया उनके पिता जी का भी रहा। अपनी ही कमाई से अपने बच्चों को का पालन – पोषण और पढ़ाई – लिखाई करवायें। खेती – बाड़ी की आमदनी को उसके दादा जी और पिता जी हमेशा ही ऊपर की कमाई समझ कर उसका अलग हिसाब रखते थे। पर रोजमर्रा की जिंदगी में उन रुपयों को खर्च नहीं करते थे।
उनकी फरमाइश थी कि मेघना के पापा बेटा – बेटी में फर्क नहीं करते और अपनी एक – तिहाई बेटी का है कहने पर पचास बीघा में कम से कम पंद्रह बीघा तो मेघना को मिलना ही चाहिए। पहले तो मेघना के पापा हक्के – बक्के रह गये। पर बाद में शाँति से बतायें कि वह जमीन उनके परदादा जी की खरीदी हुई है। वह परंपरा के अनुसार उनके बेटे और पोतों का ही जाएगा ना की बेटी को। यह बात सही है की बेटी को एक – तिहाई ज़मीन देने की बात कही है परन्तु वह स्वयं की कमाई में का ना कि अपने दादा दी की कमाई का। वे जमीन पर अड़ गये तो इसके पापा ना पर अड़ गये। अन्त में रिश्ता जुड़ नहीं पाया।
इस घटना के दस दिन बाद नीरज बाबू अपनी पत्नी के समेत मेघना के घर पहुँचे। उस दिन स्कूल की छुट्टी होती है लेकिन बाकी किसी सदस्य की नहीं होती। यह बात उन्हें पता था। उस दिन हल्के बुखार के कारण छुट्टी लेकर मेघना आराम कर रही थी। वो दोनों पति – पत्नी दिन में आए थे। उन्हें अच्छी तरह पता था कि उस समय सिर्फ मेघना की माँ ही घर पर होगी। पहले तो मेघा को देख कर थोड़े हक्के – बक्के रहे। मेघना बाद में जब वह रसोई में खाना बनाने चली गई तो वो उसकी माँ से आराम से बात करने लगे।
दोनों पति – पत्नी समझाने लगे कि इतना अच्छा रिश्ता हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। वह भी केवल पंद्रह – सोलह बीघा जमीन के लिए। रिश्ता जाने देना सही नहीं है। इस की माँ पहले तो अपने पति का हवाला देती रही पर जब वे मान नहीं रहे थे तो उस की माँ साफ – साफ कह दी कि दहेज में नकद तो बहुत अच्छा देने के लिए तैयार हैे। सोना – चाँदी तो उतना दे रहे हैं कि अन्य घरों में उतने सोने में चार – पाँच बेटियों के विवाह हो जाय। फिर भी इतना लालच अच्छा नहीं है। इस पर नीरज बाबू बोलें,’ फल अच्छा हो तो दाम भी ज्यादा होगा ना चाची जी।’
तब तक मेघना रसोई में से सुन रही थी। वह उन लोगों के लिए खाना बना रही थी। वह तुरन्त चुल्हे के दोनों बर्नर बंद की और मेहमानों वाले कमरे में घुसी। अपने गुस्से को दबाते हुए पूछी,’एक बात पूछूँ आपसे?,’ नीरज बाबू के हामी भरने पर वह सवालों का बौछार कर दी ,’यदि फल रूपी आपके भाई पसंद नहीं आया तो क्या बदला जाएगा? फल किसी बच्चे को या फिर मेहमानों को तोहफे में दिया जा सकता है। क्या आपके भाई के साथ ऐसा व्यवहार किया जा सकता है? अगर उन्हें फलों को कुछ हालातों में ज्यादा दाम में बेचा जा सकता है। तो क्या यह सब व्यवहार आपके भाई के साथ करने से इंसानियत कहलाएगा या व्यापार? भगवान की दया से मुझे मर्दों की कोई कमजोरी नहीं है कि किसी भी निहायती लालची आदमी से विवाह कर लूँ। आप पापा के दोस्त के दामाद है। इस रूप में आप आ सकते हैं लेकिन हमारे लिए कोई रिश्ता लाने की कृपा ना करे तो बड़ा उपकार होगा आपका।