विड़ंबना
घंटी की आवाज सुनाई दी। छाया करवट ली। फिर घंटी बजी। छाया की आँख खुली। एहसास हुआ कि सचमुच कोई घंटी बज रहा है। दीवार पर पड़ी घड़ी की ओर देखी पाँच बज कर पाँच मिनट हो रहा था वह बड़बड़ाती हुई कमरे से बाहर निकली,” पता नहीं यह शराबी कब सुधरेगा। वह मेरे ही सर पर क्यों मड़ गया है? अगर बेटी की शादी नहीं करनी होती तो कब का छोड़ कर चली गई होती। माँ – बाप होते तो इस शराबी से थोड़ी ही शादी होती।” वगैरा बड़बड़ाती हुई दरवाजा खोली। उसकी आँखें चौंक गईं। उसकी नींद पूरी तरह से उड़ गई। सामने पुलिस खड़ी थी। पुलिस के दो कर्मचारी छाया से पता की पुष्टि की और थोड़ा बगल हटे तो दो और कर्मचारी एक घायल आदमी को कंधे के सहारे से पकड़े हुए थे। छाया की साँस रुक गई। घायल व्यक्ति उसका शराबी पति था। उनमें से एक अधिकारी बोला की शराबी शराब पीकर सड़क के किनारे पड़ा हुआ मिला। वह भी घायल अवस्था में। अस्पताल में इलाज कर घर आकर पहुँचाने आये हैं। पीछे वाले पुलिस उसको पति को अंदर लाकर सोफे पर लेटा दिया। बाद में सामने वाले ने छाया को बटुवा दिया। उन लोगों ने बताया की बटुआ की वजह से उसके घर का पता चला। दवाइयाँ की थैली दे कर फिर संभल कर रहने की सलाह देकर वे निकल गये। छाया तुरन्त अपने बेटे को जगाई। उसका बेटा अपनी पढ़ाई का आखिरी साल में है। दोनों माँ – बेटे उसके घायल पति को अंदर कमरे में बिस्तर पर लेटा दिये। उसका बेटा, कृष्णा घटना के बारे में पूछ ही रहा था कि बाहर उसकी दादी की चिल्लाने की आवाज आई,” घंटी इतनी बार बज रहा है तो घोड़े बेच कर सो रही है। जब देखो मेरे बेटे को शराबी कहती रहती है। लेकिन अक्ल की दुश्मन आदमी काम कर के थक जाता है। तो थोड़ा पी ले तो क्या हुआ? दरवाजा खोल नहीं सकती?”। कृष्णा गुस्से में बाहर आया और कहा,” थोड़ा नहीं महीने में बीस दिन तो पीकर, कभी सड़क पर, तो कभी नाली में पड़े हुए इंसान को शराबी ही कहा जाता है।”
वैसे भी तब तक अंदर से छाया आई और कृष्णा को रुकने का आंखों से इशारा की। मतलब समझ कर कृष्णा गुस्से में अंदर चला गया। छाया हमेशा अपने बच्चों को समझाई कि वह अपने सास को कुछ भी कह सकती है। सास – बहू में लड़ाई आम बात है। तो चलता है। लेकिन बच्चों के लिए उनके दादा – दादी, चाचा – चाचा और पिता है तो उनको सम्मान देना चाहिए। भले ही वह कितने भी बुरे हो। तो भी उन्हें उनका सम्मान देना ही है। ऐसे ही बात को समझ कर कृष्णा अंदर कमरे में चला गया। वह कमरा कृष्णा और उसके चचेरे भाई के साथ साझा था। कृष्ण गुस्से में आकर अपने बिस्तर पर पड़ गया। चादर ओढ़ कर थोड़ी देर लेट गया। अपने घायल बेटे को देखने छाया की सास उसके कमरे में गई। छाया जल्दी – जल्दी झाड़ू लगाकर बाहर आँगन धोकर, नहाने चले गई। उसकी सास तब तक अपने पति और छोटे बेटे और बहू को जगा दी। सभी छाया के कमरे में पहुँच गये। वह चाय बनाने चली गई। जल्दी – जल्दी दो सब्जियाँ काटकर सब्जी बनाना शुरू कर दी। चाय सबको दे कर कमरे से बाहर निकल ही रही थी कि रोती हुई सास फिर ताने देना शुरू कर दी,”कैसी औरत है? पति घायल है। और जरा भी इसे तकलीफ भी नहीं हुई। मेरा बेटा अफसर है। तू जो साड़ी पहनती है, तेरे बच्चों की पढ़ाई, सब कुछ मेरे बेटे के कमाई से ही होता है।”
छाया बात पर बिना ध्यान दिए हुए वह सुबह का नाश्ता बनाई। चारों बच्चों के लिए स्कूल और कॉलेज जाने के लिए खाना बनाकर, डब्बों में रख दी। उसकी बेटी, शीतल, तो अपने पिता का चेहरा बिना देखे ही कॉलेज चली गई। देवर के बच्चे थोड़ी देर तक अपने ताऊ के पास बैठ कर स्कूल चले गये। छाया दोपहर का खाना बनाने में लग गई।
असल में छाया के पति की नौकरी अच्छी है। पर शराबी की पत्नी होने के कारण छाया का कोई सम्मान नहीं करता था। उसकी देवरानी आराम से सास के साथ बैठकर टीवी देखती है। पर उसे कोई कुछ नहीं कहता। छाया के माता – पिता देहांत उसके बचपन में ही हो गया। उसके चाचा – चाचा मजबूरी में घर में रख लिये। वैसे उसके माता – पिता का हिस्सा और पिता की कमाई पूरा भी चाचा – चाचा ही रख लिये। किसी तरह सरकारी स्कूल में, फिर बाद में कॉलेज में पढ़ाई करती रही। घर का पूरा काम कररे हुए बीए की पढ़ाई करना शुरू कर दी। सुबह बिना चाचा – चाचा को बताये एक घर में ट्यूशन पढ़ाती हुई अपनी छोटी – मोटी ज़रूरतों को पूरी करती रही। पर उसके चाचा – चाचा उसकी पढ़ाई पूरी होने से पहले ही हाथ पीले कर दिये।
उन्नीस साल की कच्ची उम्र में शादी हो गई। अपने पति और ससुराल को समझने से पहले ही उसका पाँव भारी हो गया। मायके की दीवार पहले ही नहीं था। ऊपर से पढ़ाई का औजार भी हाथ में नहीं था। अब पति शराबी। तो उसको सच्ची खुशी कभी नहीं मिली। वह बहुत कोशिश की कि दूसरे बच्चे को जन्म नहीं दे। परन्तु उसकी एक नहीं चली। इस बार एक बेटी हुई। और उसके पैरों में हमेशा के लिए एक जंजीर पड़ गई।
अपने बच्चों के लिए ही पूरे घर का काम करती। हाँ, देवरानी के बच्चे होने के बाद घर में झाड़ू, पोछा और बर्तन धोने के लिए कामवाली रख दी गई थी। इसी कारण अभी भी काम कर पा रही थी। पहले वह शाम में अपने बच्चो को पढ़ाने के लिए समय निकालती थी। पर अब उसकी ज़रूरत नहीं थी।
पर उसके पति के बीमार होने के बाद से उसका और काम बढ़ गया। उसकी सेहत पर असर कर रहा था। अपना पति को नहलाना इत्यादि कार्य करवाना पड़ता। क्योंकि बाएं पैर पर पट्टी बंधी हुई है तो खाना थाली में दे देने से खा लेता था। किसी तरह से दो महीनों के बाद वह दफ्तर जाने लगा। हाँ, इन दो महीनों में शराब न मिलने से घर वालों का जीना मुश्किल कर दिया था। पर किसी ने उसको शराब नहीं लाई। हाँ, उसकी सास बेटे की तरफदारी करती रही पर बाकी कोई नहीं सुने।
किसी तरह से तीसरा महीना शुरू हुआ और टेंपो में दफ्तर जाना शुरू किया। अब थोड़ा समय दोपहर में छाया को आराम करने का मौका मिलने लगा। एक घंटा बिस्तर पर लेट कर आराम करती। एक दिन कामवाली बाई धीरे से दरवाजे को खटखटाई। छाया दरवाजा खोली और पूछी.’ क्या बात है? अभी तक घर नहीं गई? दिया हुआ खाना कम पड़ गया क्या? सब्जी कम हो गई क्या?’
‘नहीं, मेंमसाहब मुझे एक बात बतानी थी। पर कैसे बताऊँ समझ नहीं आ रहा है।,’ हिचकिचाते हुए वह बोली।
‘जो भी हो बता दे’, छाया सलाह दी।
वह पहले थोड़ा हिचकिचाई पर बाद में फर्राटे से बता दी। मानो वह उस बात को ना बताये तो उसके पेट में दर्द हो जाएगा। वह बताई कि उसके गली में दो – तीन टेंपो ड्राइवर रहते हैं। उनमें से एक कभी – कभी आधी रात को रेल स्टेशन ग्राहकों को छोड़ने आता – जाता है। वह उस रात भी गया था जिस रात छाया के पति का दुर्घटना हुई थी।
असल में दुर्घटना पुलिस की गाड़ी से हुई थी। जब उन्होंने देखा कि टेंपो वाला देखा है तो उसी के टेंपो में अस्पताल लेकर गए और इलाज के बाद घर तक ले आए। टेंपो वाला छाया के पति को पहचान गया था पर चुपचाप रहा। टेंपो वाले की पत्नी उसी की गाँव की होने के कारण दो – तीन दिन पहले बताई थी। पर किस तरह से बतायें वह उसे समझ नहीं आ रहा था।
उस शाम छाया सर दर्द का बहाना कर अपने कमरे से बाहर नहीं गई। पहले बुरा लगा। सोची कि जिस पुलिस को लोगों कि रक्षा करनी चाहिए, वे ही घायल करें तो कैसे होगा? अन्त में वह निर्णय ली कि इस बात को वह किसी को भी बता कर बात बढ़ायेगी नहीं। क्योंकि बात बढ़ाने में कोई फायदा नहीं था। वैसे भी शराबी को रास्ते में कोई ना कोई ठोक दे तो बताता भी नहीं है। कम से कम पुलिस वाले उसे घर पर लाकर रख तो गये। बेटी की पढ़ाई होने के बाद, उसकी हाथ पीले करने के बाद ही माँ – बेटे को जो सोचना होगा सोचेंगे। फिलहाल तो चुप रहने में ही समझदारी लगा।