वह और मैं
बात उन दिनों की है जब मैं अपने माता – पिता के शहर से कोई सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित बड़े शहर में काम करती थी। क्योंकि राज्य में राज्य परिवहन निगम की बस सेवाएं बहुत अच्छी हैं, कई लोग आस – पास के अपने गाँव और शहरों में रहकर बड़े शहरों में काम करते थे। खासकर यदि शहर में रहते हैं तो एक्सप्रेस गाड़ियाँ और भी जल्दी पहुँचा देते हैं। तो मेरे लिए बड़े शहर की अच्छी नौकरी और अच्छे वेतन का लाभ तो मिलता था पर साथ में छोटे शहरों के कम खर्च का लाभ भी उठा पा रही थी। क्योंकि मैं अपने माता – पिता के साथ ही रह रही थी तो घर का किराया भी नहीं था। अब जो भी हो मैं सुबह – सुबह दफ्तर के लिए निकल जाती और देर शाम वापस आती। मैं अक्सर खिड़की के बगल के जगह में बैठ जाती और शाँत मन से खिड़की के बाहर प्रकृति का आनंद लेती हुई जाती और अपना काम अच्छे से करती।
बात उसे दिन की थी जिस दिन मैं बाल धोकर, साड़ी पहन कर दफ्तर के लिए निकली थी। घर पर मा बोली कि मैं उसे बैंगनी साड़ी में अच्छी लग रही थी शरद ऋतु की सुबह में आदि को खली खिड़की से आते हुए हवा केस के साथ-साथ केसरिया रंग बिखरते हुए सूरज ने मौसम में एक जादू फैलाया हुआ था मैं बहुत अच्छा महसूस कर रही थी हरे-हरे खेत तो कहीं-कहीं आत्मा के खेतों से आंखों में भी राहत महसूस कर रहा था मैं इस प्रकृति की सुंदरता का आस्वादन कर रही थी कि पता नहीं कुछ ऐसा लगा कि कोई मेरी ओर देख रहा है मैं अपना सर घुमाई मेरी सेट की दूसरी तरफ और एक सीट आगे आंखों तक ही कर दिख रहा था जैसे ही मेरी नजर उसे पर पड़ी वह अपना अपने आप को सीट के पीछे छुपा लिया मैं वापस खिड़की के बाहर देखना शुरू की तो वह वापस मुझे देखने लगा मुझे उसकी आंखों में चोली अच्छी लगी अब मैं उसके साथ आंख में चोली शुरू कर दी थोड़ी देर में आत्मविश्वास आया
पहले सोची मैं क्यों पहल करूँ? वही पहले पहल करे। इसी कारण कुछ और देर आँख मिचौली का खेल चलता रहा। परन्तु बात उसके आगे बढ़ नहीं रही थी। मेरा मन शाँत होने से मना कर रहा था। आखिर दिल और दिमाग की लड़ाई में दिल ही जीत गया। मैंने उसे इशारा किया और आँखों से मेरे पास आकर बैठने का इशारा की। वह झूमता हुआ, मचलता हुआ मेरे पास आने की जिद करने लगा। शुरुआत में तो उसके माता – पिता मना किये पर उसके जिद के सामने आखिरकार उसके माता – पिता को झुकना पड़ा। वह मेरे पास आ गया और उसे खिड़की वाली जगह चाहिए था। वैसे तो मैं किसी को खिड़की वाली सीट नहीं देती। पर दिल की बातें दिल ही जाने। मैं मान गई। वह जाकर बैठ गया। हम दोनों बस के बाहर की प्रकृति की सुंदरता को निखारते रहे। ठंडी ठंडी हवा के झोंके तो दूसरी ओर शरद ऋतु की हल्की सी गर्मी मौसम को और लुभावना और नशीली बना रही थी। वह धीरे – धीरे निंदिया रानी की गोद में चला गया। पहले तो हिचकिचाई पर फिर सोची प्यार में कैसा शर्माना। मैं उसके सर को अपने सीने से लगा ली। बस धीरे – धीरे मेरी मंजिल की तरफ जाने लगी। मैं अपने उन क्षणों का आनंद कुछ और देर तक उठाना चाह रही थी पर बस अपनी रफ्तार में आगे बढ़ते जा रही थी।
अचानक बस चालक ने वाहन को ब्रेक लगाया। उस झटके से उसकी नींद टूट गई। वह मुझे दिखा और अपने माता – पिता को ढूँढा। मैं इशारे से उसको उसके माता – पिता के स्थान को दिखलाई। वह बिना पीछे मुड़े अपने माता – पिता के पास चला गया। उसका पीछे मुड़ के ना देखना बुरा लगा पर कुछ कर नहीं सकती थी। वह अपने माता – पिता के साथ बैठ गया और थोड़ी देर बाद वह उस तरफ की खिड़की से बाहर देखने लगा। मैं कुछ नहीं कर सकती थी। मैं वापस खिड़की के बाहर देखने लगी। शहर आने में थोड़ा ही समय बचा था। अब गाड़ी थोड़ी – थोड़ी देर में रुक रही थी। थोड़ी देर तक मन उधर खींचा पर दिल पर किसी का जोर नहीं। और मैं उसके प्यार का हक जाता नहीं सकती थी।
अंत में मेरी मंजिल आ गई और मुझे उतरना था। मैं उठकर खड़ी हुई और बस की दरवाजा की तरफ बढी। मैं उसके माता – पिता की ओर देख कर मुस्कुराई। वे भी मुझे देख कर मुस्कुरायों। वह भी मुझे देखकर मुस्कुराया। उसकी माँ अपने बेटे को अपने गोद में लेकर मुझे टाटा करने को कही। वह मुस्कुराते हुए मुझे टाटा किया। मैं उसके माता – पिता को नमस्ते कह कर बस से उतर गई। मैं मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गई। क्योंकि मुझे पता है मेरे साथ ऐसा ही होता है। अक्सर पाँच और उस छोटे उम्र के बच्चों के माता – पिता मुझसे उतना ही प्यार से विदा करते हैं जैसे आज इसके माता – पिता किये। वह मुझे सदा के लिए याद रहेगा पर क्या डेढ़ साल की उम्र में की हुई यात्रा को वह अगले दिन तक भी याद रख पाएगा?