त्यौहार

मेघना और मोहन आज स्कूल से जल्दी – जल्दी घर की ओर चल पड़े। अगले दिन नाग देवता की पूजा होती है और इस त्यौहार के लिए स्कूल में छुट्टी मिली हुई थी। बच्चे वापस आते हुए देख भी रहे थे कि किस के घर कितने मेहमान आ रहे थे। घर पर दादी थी। नहा धोकर, खा पीकर दोनों अपना गृहकार्य खत्म किये। थोड़ी देर बाद बाहर दोस्तों के साथ खेलने चले गये। गाँव के बाहर कहाँ – कहाँ बिलों के आस पास सफाई हुई है, वह भी देखते हुए आये। वे वापस आने के बाद हाथ – मुँह धो कर एक घंटा पढ़ाई किये ही थे कि उनकी माँ वापस घर आ गई। दोनों किताबें छोड़कर माँ के पास भागे। माँ के गले लग कर सारी बातें बताना शुरू कर दिये। किन के घर में कितने मेहमान आए हैं इनका पूरा ब्यौरा उन लोगों ने अपनी माँ और दादी को सुनाई। उनकी माँ भी दो और घरों में मेहमान आने की बात बताई और रात में खाना खा कर अगले दिन के लिए उत्साहित होते हुए सभी सो गये।

  मोहन और मेघना का परिवार किसी जमाने में अच्छा खाता – पीता परिवार था। उनके दादा – परदादाओं ने अच्छी कमाई की थी। अच्छा घर बनवायें। खेती-बाड़ी और गाय – भैंस घर पर थे पर उनके दादाजी के मृत्यु के उपरान्त उनके पिता ने सब कुछ फालतू के कामों में लुटा दिया। उनकी दादी और माँ के जिद के सामने गायों को नहीं भेज पाया। बाकी खेत और मवेशियों को बेच डाला। तीन साल पहले उनकी पिता की मृत्यु हो गई। घर और दो गाय, लता और गीता रह गये। घर के आँगन में दो नारियल के पेड़ भी थे जो उनके लिए वरदान बना हुआ है। उन दोनों पेड़ों के बीच में बचे हुए जगह में उनकी दादी माँ ने एक उड़ूल का पौधा लगा दी। इससे तुलसी को और भगवान को अर्पण करने के लिए रोज फूल मिल जाते थे। पालक, साग, धनिया और कुछ पत्ते भी उगा लेते हैं।

उनकी माँ, लक्ष्मी हालात को संभालने के लिए गाँव में दो घरों में खाना बनाना शुरु कर दी। इस से महीने की थोड़ी आमदनी आ जाती है और साल में एक बार संक्रांति के समय दो – दो महीने भर का धान भी मिल जाता था। इस से उनका चार महीनों की धान की जरूरत पूरी हो जाती है। वैसे भी उन्हें राशन सरकार की तरफ से भी मिलती है। तो मूल जरूरतों की आपूर्ति हो जाती है। त्यौहारों में पकवान और कभी – कभार पकी हुई सब्जी और तरकारी भी मिल जाती थी। लता और गीता की वजह से दूध, दही और घी की कोई कमी नहीं थी। और हर रोज सुबह एक लीटर दूध पास के शहर के डेरी फॉर्म वालों को उनकी दादी बेच देती है। जो सुबह छः बजे गाँव के बस स्टॉप के पास देना होता है। और वह कंपनी महीने में एक बार पूरे महीने का पैसा देती है। इस से एक और जरिए से थोड़े बहुत रुपए आ जाते थे। वैसे उनकी दादी ही ज्यादा घर और गायों को बच्चों के मदद से संभालती थी। उनकी माँ को सुबह – शाम दो-दो घरों में खाना बनाते – बनाते बहुत समय घर के बाहर ही रहना पड़ता था। अगर कोई त्यौहार या शादी – ब्याह हो तो कई घंटों तक लक्ष्मी को बाहर रहना पड़ता था। दादी माँ बाती बनाने में गुणी थी। गाँव में कई उन्हें रुई देकर बाती बनवा लेते थे। इसके लिए पैसा नहीं लेती थी लेकिन गाँव वालों से अच्छा रिश्ता बना रहता था। इस काम के बदले कभी फल, साग – सब्जी या कोई अन्य उपज में से थोड़ा दे देते थे। सबसे अच्छी बात थी कि दोनों बच्चे पढ़ाई में अच्छे तो थे ही परन्तु काम काज में गुणी होने के साथ – साथ जिम्मेदार भी थे।

अगले दिन तड़के ही नहा धोकर लक्ष्मी काम पर चली गई। त्यौहार का मतलब होता है कि उनकी माँ बहुत देर से आएगी। बच्चे उठ कर तैयार हो गये। दादी माँ के संग घर पर ही पूजा कर लिये। उन्हें पता था कि यह त्यौहार दो तरह मनाया जाता है। एक जो बहुत सारे लोग मनाते हैं जिन में नाग देवता को बिल में अन्य चीजों के अलावा दूध और अंडा बिल में डालते हैं और प्रसाद के रूप में केला और मिठाई रखते हैं। बहुत कम परिवार होते हैं जिन की परंपरा घर पर नाग देवता की मूर्ति पर दूध डाल कर पूजा करने की होती है। इसलिए वे घर पर पूजा किये। सुबह का नाश्ता कर दोनों पढ़ाई करने बैठे लेकिन ध्यान कहीं और ही था। करीब बारह बजे उनकी माँ वापस आई। उन से पता चला कि गाँव के पूर्वी ओर के सभी परिवारों का पूजा – पाठ खत्म हो गया है। और वे या तो दोपहर के खाने के लिए बैठे हैं या फिर बैठने वाले हैं। जिन घरों में लक्ष्मी काम करती है उन में से एक परिवार बस थोड़ी देर पहले ही पश्चिम की ओर गया है। उनकी माँ  को दक्षिण ओर का कोई पता नहीं था परंतु उत्तर की तरफ से दो परिवारों को वापस आते हुए देखी। तो फैसला हो गया। दोनों भाई – बहन दो – दो झोला लेकर चले गये। लक्ष्मी संभलने की बात कही। उनकी दादी माँ समझाई कि लोग पहले ही पटाखे वगैरह फोड़ चुके हैं ताकि अगर कोई साँप गलती से भी वहाँ हो तो चले जाए। ऊपर से गाँव में केवल चीटियों के ही बिल है साँप के नहीं। फिर भी, माँ का दिल माँ का होता है। वह दोनों पहले पूरब की ओर गये। वहाँ से अंडे, नारियल और केले अलग – अलग झोले में डाल कर बड़े ध्यान से ले आयें। इस तरह तीन बार में पूरब का हो गया। और दो फेरों में उत्तर का हो गया। बाकी दोनों ओर खाना खाने के बाद पूरी करने की बात पर फैसला हो गया। उनकी दादी माँ ने पूरे आठ अंडों के चार आमलेट बना दी थी। लक्ष्मी को दोनों परिवारों से पकवान तो मिले ही थे। पर एक परिवार ने मछली तो एक ने मुर्गे की सब्जी दी थी। तो चारों मजे से खाए – पिये। फिर बाद में सात – आठ चक्कर लगाने पर दोनों बच्चों का काम हो गया। इधर लक्ष्मी नारियल को छाटने लगी और उसकी सास उन्हें धो कर एक भाग को काटना शुरू कर दी। उन काटे हुए टुकड़ों को नारियल का तेल बनाने के लिए सुखा दी। जो हिस्सा तेल के लायक नहीं था उस हिस्से से मिठाई बना दी। उसी तरह से अध पके केलों को एक तरफ और पके हुए केलों को एक तरफ रख दिये। अधिक पके हुए केले से पकवान बना दी जो दो से तीन दिन तक रखा जा सकता था। उस रात थके हुए बच्चे और लक्ष्मी जल्दी खाना खाकर सोने चले गये। दादी माँ घर का काम पूरा कर वह भी सोने चली गई। उस रात सभी बहुत थक गये थे। उत्साहित भी थे पर निश्चिंत भी थे। अगले दिन अंडों को शहर में बेच देने से जो रुपए आएंगे उन्हें दोनों बच्चों के नाम उनकी आगे की पढ़ाई के लिए जमा कर देंगे। नारियल से जो तेल निकालेंगे उस से साल भर के लिए बालों के लिए और पूजा के लिए हो जाएगा। यह सोचते हुए लक्ष्मी खुश है। दादी माँ सोच रही थी कि अगले दो सप्ताह तक बच्चों के लिए मिठाइयाँ और पकवान बनाने की जरूरत नहीं है। बच्चों के लिए स्कूल के लिए डब्बों में रखने के लिए पकवान और शाम को स्कूल से वापस आने पर दो – दो केले देने से काम खत्म हो जाएगा। उसी तरह से आगे कुछ दिनों तक साग – सब्जियाँ ज्यादा खरीदने की भी जरूरत नहीं है। अंडे और घर के आँगन में पालक, साग, धनिया जैसे पत्तों से अच्छे से गुजारा हो जाएगा। बच्चे खुश इसलिए हैं कि इस त्यौहार के बाद उनकी माँ और दादी माँ कम परेशान रहती हैं। इन दो सप्ताह में उनके खर्च कम होंगे तो उन दोनों को आने वाले बड़े त्यौहार के लिए कपड़े खरीदे जाएंगे। दादी माँ के लिए सूती साड़ी खरीदी जाएगी। जहाँ तक उनकी माँ का सवाल है, उन्हें हर साल दोनों परिवार, जहाँ वह खाना बनाती है एक – एक नया साड़ी देते हैं। साड़ी के हिसाब से दोनों सास – बहू आपस में बाँट लेती हैं।

 अपने – अपने ख्याल, अपने – अपने हिसाब, अपना – अपना फायदा। लेकिन एक बात है जो कि सभी के मन में बिल्कुल एक जैसी ही थी। काश ऐसा त्यौहार साल में दो – चार बार आता तो जीवन थोड़ी सरल हो जाती।